मैं फिर भी तुमको चाहूँगा…

रात के हौले-हौले गहरे होते अंधियारे को ओढ़कर छत की फर्श पर बैठ, मैं आसमान को निहार रहा हूँ । आसमान रूपी थाली में मोतियों सा प्रतीत होने वाले तारों का घनत्व काले बादलों के छटने से गहरा महसूस हो रहा हैं। अमावस्या की इस कृष्ण रात्रि में चंदा मामा अपनी चकोर चांदनी के संग विश्राम कर रहे हैं। माँ स्वर्णरेखा की महीन धारा को गले लगाकर आने वाले पवन के अनछुई झोकों से मन में अद्धभुत आत्मीयता और सुकून हैं।

दिनभर वातावरण में मानवीय आवश्यकताओं और भूखों को संतुष्ट करने के प्रयास में जनित विभिन्न प्रदूषण, विशेषरूपेन ध्वनि प्रदूषण के आस्तित्व खोने से सुकूनदायक अनुभूति मंदिम-मंदिम महसूस हो रही हैं।

छत के इस रमणीय परिस्थिति में निदिया रानी मुझे नींद के आगोश में लेकर सपनों के संसार की सैर करवाने की कोशिश और ज़िद साथ-साथ किये जा रही, जबकि मस्तिष्क किसी भी कीमत पर सोने को तैयार नहीं। आज शहर के विभिन्न गली, बाजारों में भटकर थकने के वावजूद निंदिया के आमंत्रण को अस्वीकार करना, कुछ तो विशेष ‘यादों की बारात’ गुजर रही हैं मेरे मानस पटल पर। अंततः आंखों ने मस्तिष्क के समक्ष घुटने टेकते हुए हार मानकर, उत्सुकता वश थोड़ी देर में प्रारंभ होने वाले यादों के इस चलचित्र का दर्शक बनाना स्वीकार किया। असमान पर टिमटिमाते इन मोती समान तारों में मैं खुद और अपनी जानेजिगर  को निहार रहा हूँ |

“तुम मेरे हो इस पल मेरे हो,

कल शायद ये आलम ना रहे,

कुछ ऐसा हो तुम तुम ना रहो,

कुछ ऐसा हो हम हम ना रहे,

ये रास्ते अलग हो जाये,

चलते चलते हम खो जोये…!

मैं फिर भी तुमको चाहूँगा,

मैं फिर भी तुमको चाहूंगा…!”

भारतीय आशिकों के घायल दिल को अपनी गीत से कुरेदने वाले गायक अरिजीत सिंह जी अभी मेरे मोबाइल में गुनगुना रहे थे। उत्सुकता से आंखे खुल गयी, तो देखा प्रकाशमान हो चुके मेरे स्क्रीन पर हमारी फलानी जी का नाम छपा हैं। आंखों में हाथ मलते हुए, कॉलिंग आइकॉन को हरियाली सुंघाया तो आवाज आयी।

हैल्लो, कहाँ हो…” हमार जानेमन बड़ी मासूमियत से पूछताछ कर रही थी।

घर मे ही सोया हूँ, बोलो…! कौन सा पहाड़ गिर पड़ा..?” मैंने नींद में उखड़ते हुए बोला।

हद्द हो यार, कभी तो प्रेम-शेरेम से बतिया लिया करो..। तुम्हारी इन्ही अन्दाज से कई बार हमका फील होता हैं कि रिंकू भौजी ने वो गाना हमरे लिए बनाई होगी….’मेरे बॉयफ्रेंड मुझकों प्यार नही करते, जिंदगी बर्बाद हो गया।’……” वो फटर फटर बोलते जा रही थी, शिकायतों के पिटारे को समेटे उसके आवाज में आज आशिक़ाना खुमार और खिंचाई वाली मजाकिया अंदाज का मिश्रण था।

मैंने बीच मे रोकते हुए कहा “ऐसा कुछूओ नही है, ऐ हमारी काजू-किशमिश… जान दे देंगे तोहरा ख़ातिर.. बोलों चाहिए का….

रुलाएगा का रे, पगलेट..जुग-युग जीयो ऐ हमारे महाराज जी, हमरी उमरिया भी तोहरा खाता में ट्रांसफर हो जाए। ऐ जी, सुनो न एक्चुअली कल हमारी बुआ की बेटी की शादी में जाना हैं, सो शॉपिंग-ओपिंग करनी हैं।” उसने धैर्य के साथ अपनी बात रखी।

पूर्वानुमान होने के बावजूद मेरे मुंह से अनायास निकल पड़ा “तो……?

ये तो तो आज मुझे काल के गाल में ढकेल चुका था।सुनने के लिए मानसिक रूप से तैयार हो ही रहा था कि ये क्या..? आज वो अन्य दिनों के समान उखड़ी-सुखड़ी नही थी…अपने मुंह से मधु छलकाते हुए बोली “तो तो क्या…? अकेले थोड़े न जाउंगी मार्केट, चलोगे साथ मे तुम भी। तैयार होकर चौक तक आ जाओ, मैं स्कूटी लेकर कुछ ही देर में आ रही हूं।

शॉपिंग के नाम सुनते ही नींद में धबढाई आँखों में आँशु आ गए। परंतु उसके मधु वचनों से मधुमेह का शिकार हुआ मेरा मन नींद की तिलांजलि देते हुए विवशता पूर्वक हामी भरी। मन में तरह तरह के विचार आ रहे थे। ये महिलाएं भी न, एक बार रिश्ता जुड़े की नहीं, कितनी आसानी से शाये की तरह तन-मन-धन से जुड़ जाती हैं।

ढलते दोपहर में बिस्तर और नींद की तिलांजलि देकर, जल्दी जल्दी तैयार होने लगा। अगले 10 मिनट में अपनी माताश्री से सच्ची-झूठी कहानी गढ़कर अनुमति और ₹100 के 2 नोट ले ली और पैदल ही चौराहे की ओर आगे बढ़ा।

अभी 10 मिनट ही हुवे होंगे की मैं चौराहे पर बरगद तले बने चबूतरे पर आराम फरमा रहा था। दायीं पॉकेट से मोबाइल निकाला और उसका नम्बर 9798****** को मोबाइल के स्क्रीन पर उकेरा। वाह रे मेरी यादास्त… मार्क्स लाने के लिए जरूरी अंको और प्रतीकों के संयोजन से बने फॉर्मूले सामान्यतः भूलकर अनेकों बार परीक्षा में फूल साबित हो चुका हूँ और एक उनका नम्बर हैं, दायें-बायें-अग्र, मस्तिष्क के हर कोने में इस कदर सुरक्षित हैं कि मोबाइल-फोनबूक गुम हो जाय तो भी कोई बात नही।

पहली बार कॉलिंग बटन को दबाया ही था कि उसके मोबाइल ऑपरेटर वाली सौतन ने हमारी फलनिया के व्यस्तता का राप अलापा। एक्चुअली बिजी, नम्बर ऑफ, आउट ऑफ रेंज की सूचना देने वाली ये मोहतरमा हमारी किशमिश के बाद कोई सबसे ज्यादा संवाद करता हैं तो ये। मोबाइल ऑपरेटर वाली महिला के निर्देशानुसार दुबारा प्रयास किया तो इस बार कॉल मिल गयी।

हेल्लो…. हेलो….! कहाँ हो रे अबतक तुम.. मैं कब से तुम्हारा वैट कर रहा हूँ” मैंने कहा।

अरे सॉरी बाबा, लेट हो गयी। तैयार होने में थोड़ा समय लग गया, ये मम्मी भी न ।आ रही हूं, रास्ते में ही हूँ..!” उसने मुझसे कहा, साथ ही साथ पीछे से आवाज आयी “बेटा, हेलमेट तो पहन लो..!” ये हमारी करेजा की माता जी थी। “आराम से आओ, समझ में आ गया, तुम रास्ते में कहाँ हो..!“इसके साथ ही मैं जोर जोर से हंस पड़ा।”तुम भी…“इतना कहते हुए हँसते हुए उसने कॉल समाप्त किया।

चौराहे पर बरगद के एक किनारे से चाय की खुशबू आ रही थी। चाय रूपी कस्तूरी के लिए मै चाय बेचने वाले बाबा की झोपड़ी में दस्तक दी। बिना किसी संवाद के बाबा ने चाय की प्याली मेरे और बढ़ाई। इस गर्मी में चाय की चुस्की मेरे ओठों को ऐसे छू रही थी, मानो गर्म लौहे में खोलते पानी ने स्पर्श किया हो। पहली घुट में ही अपनी मुँह जला लेने के बाद मैं बची चुस्कियां फुक-फुक कर पी रहा था।

अभी चाय खत्म कर ₹10 का नोट बढ़ा ही रहा था कि एक काले रंग की हौंडा डियो स्कूटी मेरे सामने आकर रुकी। हेलमेट पहने हुए, काले रंग के जीन्स और सफ़ेद कुर्ती में एक पतली से लड़की स्कूटी से उतरी |सफ़ेद कुर्ती में छोटे-छोटे लाल, हरे, पीले, नीले फूल काफी जच रहे थे । पैर पिछले सोपिंग के दौरान श्रीलेदर से लिए डिजाईनर जूती से सोभंवित था, जिसको देखकर पहचानने और समझने में मुझे देर नही लगी | स्कूटी से उतरकर उसने अपनी हेलमेट उतारी फिर खुले बालो को एक बार लहरा दिया | हाय-हाय पूरा फिल्म टाइप का लग रहा था|

उसकी कातर नैनों की आतुरता मुझें खोज रही थी | इतने में मैं खुद को उसके समक्ष प्रकट होने से रोक नही पाया | माथे पर दो पिम्पल और गाल में गड्ढे को धारण किये हमरी मासूम सी लड़की मेरे सामने स्कूटी को स्टैंड में देकर खड़ी हैं। झुकी कजरारी आँखे, चेहरे पर लज्जा, मेरे हरेक बकवास सर हिलाकर हामी भरती। छोटे से चेहरे वाली ये मासूम आज काफी सभ्य लग रही थी | आँखों में ऑय लाइनर की काली लकीरे, गले में कंधे तक लटका दुपट्टा, कानों में छोटी सी क्यूट चमकीले पत्थर वाले टॉप, हाथ में नयी-नवेली फ़ास्ट-ट्रैक की यूनिसेक्स वर्शन वाली कलाई घड़ी, भूरे रंग का कॉलेज बैग और उसके दायें साइड पर आधी भरी वाटर बॉटल, नाखूनों में कुछ डिजाईन बनाया था उसने, जो कुछ पुरानी हो चुकी थी। बाये हाथ के दो अंगुलियों पर अंगूठियां पहन रखा था उसने। आज नयी नयी पायल पहना हैं उसने जिसके घुघरू की छमछम मुझे मदहोश करने के लिए काफी थी |

सुन्दरता में अविभूत होकर मैं उसको अभी तक एकटक निहार ही रहा था कि वो बोल पड़ी:

“चेहरा क्या देखते हो, दिल में उतर कर देखो न”


कहानी जारी हैं….. जुड़े रहिए |

कहानी की अगली कड़ी पढ़ने के लिए क्लिक करे : मैं फिर भी तुमको चाहूँगा… -2



© Pawan Belala


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30 thoughts on “मैं फिर भी तुमको चाहूँगा…

  1. ठीक ही बोली—-दिल में उतारकर देखो ना—-भाई जब चेहरे से नजर नहीं हटती तो दिल में उतरकर की होगा—-आगे पढ़ते हैं—–लाजवाब

    Liked by 1 person

    1. हार्दिक धन्यवाद समीर जी..💐
      जरूर, आप जैसे प्यारे पाठकों के इंतजार को खत्म करते हुए कहानी की अगली कड़ी जल्द से जल्द मुकम्मल कराने की मेरी कोशिश होगी।

      Liked by 1 person

  2. very beautiful poen .Good bless you. read my poems .
    Give your comments as Ido.
    one more thing My book STRAIGHT FROM THE HEART is on sale on http/notion press/read/straight from the heart.
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    Liked by 1 person

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