तू किसी रेल-सी गुज़रती है, मैं किसी पुल-सा थरथराता हूँ…दुष्यंत कुमार

मैं जिसे ओढ़ता-बिछाता हूँ,
वो ग़ज़ल आपको सुनाता हूँ..!

एक जंगल है तेरी आँखों में,
मैं जहाँ राह भूल जाता हूँ..!
तू किसी रेल-सी गुज़रती है,
मैं किसी पुल-सा थरथराता हूँ..!

हर तरफ़ ऐतराज़ होता है,
मैं अगर रौशनी में आता हूँ..!

एक बाज़ू उखड़ गया जबसे,
और ज़्यादा वज़न उठाता हूँ..!

मैं तुझे भूलने की कोशिश में,
आज कितने क़रीब पाता हूँ..!

कौन ये फ़ासला निभाएगा,
मैं फ़रिश्ता हूँ सच बताता हूँ..!

दुष्यंत कुमार


Main jise odhata-bichhaata hoon,
Wo gazal aapako sunaata hoon..!

Ek jangal hai teri aankhon mein,
Main jahaan raah bhool jaata hoon..!
Tu kisi rail-si guzarati hai,
Main kisi pul-sa tharatharaata hoon..!

Har taraf aitaraaz hota hai,
Main agar raushani mein aata hoon..!

Ek baazoo ukhad gaya jabase,
Aur zyaada vazan uthaata hoon..!

Main tujhe bhoolane kee koshish mein,
aaj kitane qareeb paata hoon..!

kaun ye faasala nibhaega,
main farishta hoon sach bataata hoon..!

Dushyant Kumar

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