नारी पुरुष की स्त्री, पुरुष नारी का पूत…

कैसा जादू है समझ आता नहीं,
नींद मेरी ख़्वाब सारे आप के…!
इब्न-ए-मुफ़्ती

अन्य दिनों के अपेक्षा आज आँखें मेरी तनिक देर से खुली। आंखे खुली तो हमेशा की भांति सर्वप्रथम अपने मासूम उंगलियों के स्पर्श से मोबाइल फोन को अनलॉक किया और सोने की जिद्द व नींद के नशे में लबरेज अधखुली आँखों को मोबाइल के प्रकाश मय स्क्रीन संग कनेक्ट किया।

ये किया, व्हाट्सएप के चैट बॉक्स पर अबतक संदेशो की बमबारी हो चुकी थीं।’टू-टू’ के आवाज संग रह रह कर फ़ेसबुक पर भी नोटिफिकेशन की गोले दागे जा रहे थे। मुझे आभास होते विलंब न हुई कि हमारे देश की त्योहारबाज जनता, आज फिर फ़ेसबुक व व्हाट्सएप में समथिंग सेलीब्रेट कर रही हैं। बट, ये समथिंग क्या हैं, बे?

चुनींदा संदेशों पर आंख सेकने मात्र से ही इस तथ्य से मेरी मानसिक जिज्ञासा अवगत हो गई, और मुँह से अनायास निकल चुका “अबे…बेंचो, आज तो इंटरनेशनल वीमेन लोगों का दिन हैं। पर ये त्यौहार के नाम पे चुतियापा काटने वाले महापुरुष, मुझ मासूम को महिला दिवस वाली शुभकामना संदेश फॉरवर्ड कर-करके… सुबह सुबह दिमाग की दही कर.. रायता क्यों फैला रहे हैं ? भेजे अपनी माय-बहिन और जानेमन को, ससुर गवार लोग.. हम इन ठरकी लोंडई लोगों को महिला लगते हैं क्या ?”

और…तो…और हमारी ई कॉलेज-यूनिवर्सिटी वाली महिला मित्र मंडली को फिर क्या होई गया, वो भी बिना कुछ विचार किये फॉरवर्ड किये जा रही हैं… “Happy Women’s Day”. सोना, बाबू, बच्चा, उल्लुलुलू तो सुना था और आज ये सब…! मेरा लोल से बकलोल हो चुका दिमाग भक्क… और फिर विभिन्न पहलुओ पर विमर्श करने लगा।
हाय, मानवी रही न नारी लज्जा से अवगुंठित,
वह नर की लालस प्रतिमा, शोभा सज्जा से निर्मित!
युग युग की वंदिनी, देह की कारा में निज सीमित,
वह अदृश्य अस्पृश्य विश्व को, गृह पशु सी ही जीवित!
सुमित्रानंदन पंत

कल तक भोर से लेकर अहर्निश तक माँ-बहनों की गलियां देने वालों के शुभकामना संदेशों के बाढ़ से मेरा इनबॉक्स आज ओवरफ्लो हो चुका हैं। प्रिया प्रकाश की स्माइल व पलकों की गोलियों में मरे जा रहे मेरे बेरोजगार मजनुआ टाइप के मित्र, आज नारीवादी नजरिये के संग अजब-गज़ब तथ्यों को नमक मीर्च के संग लेमन छिड़क कर परोस रहे है। किसी ने वेदों, उपनिषदों से पंक्तियाँ व शब्दों को चुराया हैं, तो कई संदेश ट्विटर व फेसबुक के महारथियों के ट्वीट से कॉपी पेस्ट किये गए हैं।

अब बारी थी, फ़ेसबुक की दीवार पर हाथ टटोलने की। महिलाओं के प्रति इतनी सम्मान वाह जी वाह..! हरेक कन्या को अपनी बपौती जायदाद समझकर माल व पीस शब्द से संबोधित करने वाले आज भरपूर स्वास्थवर्धक ज्ञान पेल रहे हैं।

कल तक बेटी बहनों को बोझ समझने वाले इन विचारको के अविश्वसनीय हृदय परिवर्तन से रूबरू होकर कुछ क्षणों के लिए ऐसा प्रतीत हुआ कि आज के बाद मोदी सरकार को बेटी पढ़ाओ और बेटी बचाओ कार्यक्रम से सम्बंधित जागरूकता हेतु टेलीविज़न से लेकर youtube के स्क्रीन पर विज्ञापन नही करना होगा, देश में लिंगानुपात सुधर कर 1000+ हो जायेगी, परिवार में महिलाओं के प्रति लैंगिक भेदभाव इतिहास की बात हो जाएगी, दहेज उत्पीड़न 500 और 1000 के नोटों के नोटबंदी की भांति आज से प्रचलन से बाहर हो जाएगी। ऊ का कहते हैं उसको, हाँ वही…जिन खबरों से आजकल अखबार के पन्ने भरे रहते हैं… हां रेप, वहीं बलात्कार जी और उसके बाद मोमबत्ती मार्च की तस्वीरे। ये शब्द शायद कल से इंग्लिस to हिन्दी डिक्सनरी में भी न दिखे। हमारी महिलाएं आधी रात को भी निर्भीकता से विचरण कर सकेंगी। पोलिटिकल, सोशल, इकोनॉमिक्स और समाज में नारी की बराबरी और भागीदारी सुनिश्चित तो कल से होगी ही, साथ ही उनकी बराबर की भागीदारी पक्का हैं। और…तो और..अपनी बॉलीवुड अभिनेत्री से लेकर गांव के खेतों-खलिहानों में काम करने वाली भौजाई तक को समान काम के लिए पुरुषो के समान मेहनताना मिलेगा।
यदि स्वर्ग कहीं है पृथ्वी पर, तो वह नारी उर के भीतर,
दल पर दल खोल हृदय के अस्तर
जब बिठलाती प्रसन्न होकर
वह अमर प्रणय के शतदल पर!
—-सुमित्रानंदन पंत

अब आप कहेंगे, भोरे भोरे पी लिए हो का बे, कि रात वाली ऐल्कॉहॉलिक खुमारी अभी तक दिमागी पटरी से उत्तरी नहीं। तो भैया आपको करबद्ध निवेदन करते हुए एक विनती करते हैं कि प्लीज मत भेजिए मुझे ऐसे शुभकामना संदेश…! चीड़ सी होती हैं, इन ढकोसले संदेशो से..! कुछ परिवर्तन नहीं होने वाला, ये अंतरास्ट्रीय महिला दिवस, अंतरास्ट्रीय कम, चोंचलेबाजी अधिक हैं।

स्वास्थ्य, पोषण, सुरक्षा, शिक्षा और सामाजिक सुरक्षा जैसे विषयों भारतीय महिलओं की स्थिति का अंदाजा आप 399 वाले जिओ के 1.5 या 2 GB के इंटरनेट पैक द्वारा फेसबुक के होम पेज को स्क्रूल कर या trending tweets से नही लगा सकते जनाब और न ही मुझ कुछ ब्लॉगरो के आलेख पढ़ कर।

लिबास की तरह अपनी जिंदगी में गर्ल-फ्रेंड बदलने वाले नौजवान मित्रो, औरत के लिए ”प्यार-मोहब्बत” से ज्यादा महत्वपूर्ण ”इज़्ज़त” हैं और नारी सम्मान हम सबका कर्तव्य है, जिनके अद्वितीय योगदान से समाज को संस्कार, विचार और आकार प्राप्त हुए।
नारी निन्दा ना करो, नारी रतन की खान
नारी से नर होत है, ध्रुब प्रहलाद समान।
—कबीर


© Pawan Belala 2018

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