नारी नहीं, मर्दानी थी, स्वतंत्रता की चिंगारी थी |

हम सभी के जीवन-पुस्तिका के प्रत्येक पन्नो को अपनी भिन्न-भिन्न इंद्रधनुषी भूमिकाओं द्वारा रंगने वाली नारियों को अंतराष्ट्रीय महिला दिवस पर असंख्य साधुवाद संग शुभकानाएं।
नारी नहीं, मर्दानी थी,
स्वतंत्रता की चिंगारी थी |
देश के लिए यज्ञ-वेदी में आहुति देने वाली,
ये भारतीय महिला स्वतंत्रता सेनानी थी |
यह प्रारंभ नही, यह अंत नही,
युग-युगांतर के गौरवगाथा की महारानी थी |
पार्वती, सीता, उर्मिला, सावित्री और अनुशुईया की,
कथा को ये, वर्तमान से जोड़नेवाली साड़ी थी |
माता बन कभी जन्म दिया, बहन रूप में दोस्त बनी,
पति संग कदमताल करते हुए, जीवन में फिर रंग भरी |
चमक रहे तलवार-त्रिशूल संग, स्वतंत्रता को ललकारी थी,
भारत-भूमि की प्यास मिटानेवाली, ये नारी नही, मर्दानी थी |
झांसी की रानी लक्ष्मीबाई को श्रधा सुमन संग समर्पित ये पंक्तिया:
माँ भारती की चीख-पुकार सुन, मनु लक्ष्मीबाई बन आई थी |
ओझ, पराक्रम और तलवार के दम पर, झांसी में झंडा फहराई थी |
लड़ी अंत तक अंग्रेजों से, वीरगाथा सुभद्रा ने गाई थी |
मरोपंत-भागीरथी की ये बेटी, पहली महिला सेनानी थी |
‘भारत की कोकिला’ सरोजनी नायडू को नमन करते हुए ये पंक्तिया
सरोजनी था नाम उनका, गांधी संग कदम मिलाई थी |
कविता और लेख के जरिये, स्वाधीनता की अलख जगाई थी |
कारावास की यात्रा करके, देशप्रेम के दियें सुलगाई थी
भारत की इस संघर्षशील बेटी ने, संघर्ष से जीत पाई थी |
सूची बड़ी हैं, गौरव गाथा पवित्र हैं,
नर-नारी ने मिलकर कदम मिलाएं थे |
कस्तूरबा संग गांधी हो, या
नेहरू-कमला की जोड़ी हो |
देशहित और बेहतर कल के लिए,
खूब सही कुर्बानी थी |
नारी नहीं, मर्दानी थी,
स्वतंत्रता की चिंगारी थी |
देश के लिए यज्ञ-वेदी में आहुति देने वाली,
ये भारतीय महिला स्वतंत्रता सेनानी थी |
धर्म-जात को ताक पर रखकर, सबने लड़ी लड़ाई थी |
रानी-चेन्नमा, हजरत बेग़म ने, मिलकर कही कहानी थी |
अरूण-आसिफ, ऐनी बेसेंट को किसने भूला,
रामगढ़ की रानी से किसी ने पार न पाई थी |
इंदिरा के वानर सेना में, छुपी हुई सच्चाई थी |
विजय-लक्ष्मी पंडित हो या हो, ग़रीब अमीर की बहु-बेटी,
सबने मिलकर लड़ी लड़ाई, तब स्वाधीनता पाई थी |

आप निम्न लिंक द्वारा इस कविता पाठ के आनंद में विभोरित हो सकते हैं :

अंतिम कुछ पंक्तियाँ, वर्तमान परिपेक्ष्य में
एक युद्ध अब आन पड़ी हैं,
स्वतंत्रता देवी ललकार पड़ी हैं |
बेटियों पर हो रहे अत्याचारों से,
दुर्गा-काली बौखला पड़ी हैं |
हे देवी,
अतीत के स्वर्णिम पन्नों से सीख,
अत्याचारों की गठरी साफ करो |
उठो, जागों, कुछ काम करो,
कण-कण में देश प्रेम का भाव भरो |
दुष्टों का संहार करो, जयचंदों का रक्तपान करो |
वर्तमान के सुनहरे पन्नों में, भय-भूख-भ्रष्टाचार का काम तमाम करो |
हे मर्दानी लक्ष्मीबाई की बेटी,
उठो, जागों, कुछ काम करो,
कण-कण में देश प्रेम का भाव भरो |


© Pawan Belala 2018

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