मनाही हैं !

कई साल बीते, कुछ महीने छूटे,
सप्ताह-दिनों की तो आनी जानी हैं।
जीवन के उस अधूरे हिस्से में आज भी,
सबके आने की मनाही हैं।

सावन-भादो सब बीत गया,
होठों पे मुस्कान बेमानी हैं।
आम पीपल सब ठूंठ हो गए,
नदी रेत से मांगे पानी हैं।

सिसकतीं ख्वाइशे, तन्हाई और रुसवाई में,
चर्चाओं का चनाचूर गरम हैं।
महफ़िलो में सुकून-ए-दिल भी बेंच,
रात की आहटों में तुझे झाकते हैं।

इंतजार की बेक़रारी में,
लिखी तुझपर एक कहानी हैं।
जीवन के उस अधूरे हिस्से में आज भी,
सबके आने की मनाही हैं।


©पवन Belala Says 2018

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