हिंदी Vs भारतीय भाषाएँ एवं बोलियां


टाइम्स ऑफ़ इंडिया में प्रकाशित आलेखानुसार 2011 के जनगणना के आधार पर हिंदी बोलने वाले लोगों में 2001 में 41.03 फीसदी की तुलना में 2011 में इसकी संख्या बढ़कर 43.63% हो गई है। भारत में दूसरी सबसे ज्यादा बोली जाने वाली भाषा बंगाली हैं। तेलगू को तृतीय पायदान से अपदस्त कर, मराठी ने आकड़ो में काफी उलटफेर कर बाजी अपने नाम कर ली हैं। संविधान … Continue reading हिंदी Vs भारतीय भाषाएँ एवं बोलियां

Sticky post

सुबह-ए-उद्यान (Live From Park)


‘उफ्फ… थक गया यार।‘ पार्क के किसी किनारे पर खाली पड़े कुर्सी पर पसरता, मैं मन ही मन बड़बड़ाते हुए माथे पर छलके पसीने को हाथों से निचोड़ा। पेंट के दाएं पॉकेट की जीप खोल पॉकेट से मोबाईल निकाला। तर्जनी स्पर्श द्वारा मोबाईल पाश खोलने के उपरांत…गूगलवा का कनिष्ट एप्प पुत्र गूगल फिट पर हथोड़ा रूपी अंगुष्ठ प्रहार किया, परिणामस्वरूप एक चीत्कार संग कुछ आकड़े … Continue reading सुबह-ए-उद्यान (Live From Park)

‘राखी’ / सुभद्राकुमारी चौहान


झाँसी की रानी कविता की रचना द्वारा राष्ट्रीय चेतना की चिंगारी लगानेवाली, हिन्दी की सुप्रसिद्ध कवयित्री और लेखिका सुभद्रा कुमारी चौहान जी की एक काव्य-रचना भाई-बहन के मध्य स्थापित अटूट रिश्ते को समर्पित ‘राखी’ रचना…विदा लेते सावन की फुलझड़ियों संग आपसे साझा कर रहा हूँ… भैया कृष्ण ! भेजती हूँ मैं राखी अपनी, यह लो आज। कई बार जिसको भेजा है सजा-सजाकर नूतन साज।। लो आओ, … Continue reading ‘राखी’ / सुभद्राकुमारी चौहान

मौत से ठन गई…


२०वी शताब्दी के अंतिम दशक में पले-बड़े युवाओं ने राष्ट्पति के रूप में कलाम और प्रधानमंत्री के रूप में वाजपेयी जी के दिव्य नेतृत्व में भारतीय राजनीति का स्वर्ण काल जीया हैं। हमारे झारखण्ड राज्य के गठन कर्ता शिल्पकार अटल जी के प्रति, हम झारखंडियों में अपार श्रद्धा हैं। राजधानी दिल्ली स्थित अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (AIIMS) में भर्ती पूर्व प्रधानमंत्री भारत रत्न श्री अटल बिहारी … Continue reading मौत से ठन गई…

आज़ादी अभी अधूरी है…


‘तहत्तर(₹70) रुपिया में आधा किलो…भाईया’ रंगबिरंगी पोशाकों में सज स्कूल जाते बच्चों को निरीह आँखों से निहारते इस मासूम ने तुतलाते हुए कहा। 72वे स्वतंत्रता दिवस के विहान में अभी कुछ ही देर में एक अल्पसंख्यक संम्पन्न वर्ग, खूब फलाना-ढिमका तरीकों से देश के कायाकल्प की खूब बकचोदी पेलते हुए उपलब्धियाँ की गिनती गिनायेगा और हमलोग ताली पीटेंगे। परंतु, साहेब… हमें आज भी 1, 2, … Continue reading आज़ादी अभी अधूरी है…

खैनी-चूना सा ये इश्क़ हैं… 💓


बड़े-बड़े नामी डाकटर साहेब लोग अकसर यह लैक्चर बकते पाए गए हैं कि तंबाकू-चूने के मिश्रण को होठों और गालों के अंदर चुटकी में भर कर दबाने की आदत मुंह के कैंसर को दवात देती हैं। अब देखो दादा, हमने कोनों रिसर्च या MBBS तो किया नही हैं, न ही मुझे सरकार के ‘ये मुकेश हैं‘ वाले विज्ञापनी दावों पर प्रश्नचिन्ह लगा कर चक्की पिसिंग … Continue reading खैनी-चूना सा ये इश्क़ हैं… 💓

Diversity in unconditional friendship


Last week, I was searching  something in old books lying on the book shelf of my room. A wide collection of Books from the initial Nursery class to 10th-12th were covered themselves with dust sheet. While eliminating the dust from books, I got an old textbook of Class 6 titled Social and Political Life-I published by NCERT. A short story in its very first chapter titled ‘Understanding Diversity’ … Continue reading Diversity in unconditional friendship

बेचारे Uncle चच्चा बन गए..


अपने छुटकू से शहर में, आज फिर अनजान-पहचान से गलियों में मंजिल की फ़िक्र के बिना पथिक रूपेण भटकने निकला था…मैं! अभी कुछ ही दूर, मुझे नंगे पैर मैली-कुचली यूनिफॉर्म और कांधे पर झोला लटकाये स्कूल से आते छोटे-मोटे हँसते खिलखिलाते नन्हे नटखटो की टोली दिखाई दी, जो सरकारी स्कूल रूपी कैदी खाने से मुक्त हो कर बाहर ही निकले थे…। उनको देखकर मे कुछ … Continue reading बेचारे Uncle चच्चा बन गए..

बोराये मन को बहलाता हूँ…!


मैमन्ता मन मारि रे, घट ही माहैं घेरि । जबहिं चालै पीठि दे, अंकुस दै-दै फेरि ॥ —कबीर (भावार्थ – मद-मत्त हाथी को, जो कि मन है, घर में ही घेरकर कुचल दो ।अगर यह पीछे को पैर उठाये, तो अंकुश दे-देकर इसे मोड़ लो ।) हृदय में उमड़ती भावनायें व मस्तिष्क में उमड़ा विचार कितना क्षणभंगुर होता हैं न..। मन-मस्तिष्क में कई बार इतने … Continue reading बोराये मन को बहलाता हूँ…!

तोड़ो – रघुवीर सहाय


नवाबों के शहर लखनऊ में जन्मे, पेशे से पत्रकार स्व. रघुवीर सहाय जी की लिखी एक कालजयी उद्बोधनपरक कविता आज आपसबों संग साझा कर रहा हूँ। तो आइए, इन पंक्तियों में गोते लगाते हुए हम सृजन हेतु पथ पर अवरोध उत्पन्न करने वाले पत्थर-चट्टानों को तोड़ते हैं…. तोड़ो तोड़ो तोड़ो ये पत्‍थर ये चट्टानें ये झूठे बंधन टूटें तो धरती का हम जानें सुनते हैं … Continue reading तोड़ो – रघुवीर सहाय